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Thread: गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के ç

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    गरुड़जी के सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डि के उत्तर

    चौपाई :
    * पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ॥।
    नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न मम कहहु बखानी॥1॥

    भावार्थ:-पक्षीराज गरुड़जी फिर प्रेम सहित बोले- हे कृपालु! यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नों के उत्तर बखान कर कहिए॥1॥
    * प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा॥
    बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी॥2॥

    भावार्थ:-हे नाथ! हे धीर बुद्धि! पहले तो यह बताइए कि सबसे दुर्लभ कौन सा शरीर है फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचार कर संक्षेप में ही कहिए॥2॥
    * संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु॥
    कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला॥3॥
    भावार्थ:-संत और असंत का मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभाव का वर्णन कीजिए। फिर कहिए कि श्रुतियों में प्रसिद्ध सबसे महान्* पुण्य कौन सा है और सबसे महान्* भयंकर पाप कौन है॥3॥
    * मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई॥
    तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती॥4॥
    भावार्थ:-फिर मानस रोगों को समझाकर कहिए। आप सर्वज्ञ हैं और मुझ पर आपकी कृपा भी बहुत है। (काकभुशुण्डिजी ने कहा-) हे तात अत्यंत आदर और प्रेम के साथ सुनिए। मैं यह नीति संक्षेप से कहता हूँ॥4॥
    *नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही॥
    नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी॥5॥

    भावार्थ:-मनुष्य शरीर के समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। वह मनुष्य शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्ष की सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्ति को देने वाला है॥5॥
    * सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर॥
    काँच किरिच बदलें ते लेहीं। कर ते डारि परस मनि देहीं॥6॥

    भावार्थ:-ऐसे मनुष्य शरीर को धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्री हरि का भजन नहीं करते और नीच से भी नीच विषयों में अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणि को हाथ से फेंक देते हैं और बदले में काँच के टुकड़े ले लेते हैं॥6॥
    * नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं॥
    पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया॥7॥
    भावार्थ:-जगत्* में दरिद्रता के समान दुःख नहीं है तथा संतों के मिलने के समान जगत्* में सुख नहीं है। और हे पक्षीराज! मन, वचन और शरीर से परोपकार करना, यह संतों का सहज स्वभाव है॥7॥
    * संत सहहिं दुख पर हित लागी। पर दुख हेतु असंत अभागी॥
    भूर्ज तरू सम संत कृपाला। पर हित निति सह बिपति बिसाला॥8॥
    भावार्थ:-संत दूसरों की भलाई के लिए दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरों को दुःख पहुँचाने के लिए। कृपालु संत भोज के वृक्ष के समान दूसरों के हित के लिए भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खाल तक उधड़वा लेते हैं)॥8॥
    * सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाई बिपति सहि मरई॥
    खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥9॥
    भावार्थ:-किंतु दुष्ट लोग सन की भाँति दूसरों को बाँधते हैं और (उन्हें बाँधने के लिए) अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! सुनिए, दुष्ट बिना किसी स्वार्थ के साँप और चूहे के समान अकारण ही दूसरों का अपकार करते हैं॥9॥
    * पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥
    दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥10॥
    भावार्थ:-वे पराई संपत्ति का नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेती का नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्ट का अभ्युदय (उन्नति) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतु के उदय की भाँति जगत के दुःख के लिए ही होता है॥10॥
    * संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥
    परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा॥11॥
    भावार्थ:-और संतों का अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चंद्रमा और सूर्य का उदय विश्व भर के लिए सुखदायक है। वेदों में अहिंसा को परम धर्म माना है और परनिन्दा के समान भारी पाप नहीं है॥11॥
    * हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्र पाव तन सोई॥
    द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि॥12॥
    भावार्थ:-शंकरजी और गुरु की निंदा करने वाला मनुष्य (अगले जन्म में) मेंढक होता है और वह हजार जन्म तक वही मेंढक का शरीर पाता है। ब्राह्मणों की निंदा करने वाला व्यक्ति बहुत से नरक भोगकर फिर जगत्* में कौए का शरीर धारण करके जन्म लेता है॥12॥
    * सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥
    होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥13॥
    भावार्थ:-जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदों की निंदा करते हैं, वे रौरव नरक में पड़ते हैं। संतों की निंदा में लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोह रूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञान रूपी सूर्य जिनके लिए बीत गया (अस्त हो गया) रहता है॥13॥
    * सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥
    सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥14॥
    भावार्थ:-जो मूर्ख मनुष्य सब की निंदा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस रोग सुनिए, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं॥14॥
    * मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला॥
    काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा॥15॥
    भावार्थ:-सब रोगों की जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियों से फिर और बहुत से शूल उत्पन्न होते हैं। काम वात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है॥15॥
    * प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई॥
    बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना॥16॥
    भावार्थ:-यदि कहीं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जाएँ), तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनता से प्राप्त (पूर्ण) होने वाले जो विषयों के मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं, उनके नाम कौन जानता है (अर्थात्* वे अपार हैं)॥16॥
    चौपाई :
    * ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई॥
    पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई॥17॥
    भावार्थ:-ममता दाद है, ईर्षा (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गले के रोगों की अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराए सुख को देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मन की कुटिलता ही कोढ़ है॥17॥
    * अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ॥
    तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी॥18॥
    भावार्थ:-अहंकार अत्यंत दुःख देने वाला डमरू (गाँठ का) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसों का) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदर वृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं॥18॥
    * जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लगि कहौं कुरोग अनेका॥19॥
    भावार्थ:-मत्सर और अविवेक दो प्रकार के ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँ तक कहूँ॥19॥
    दोहा :
    * एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि।
    पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि॥121 क॥
    भावार्थ:-एक ही रोग के वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत से असाध्य रोग हैं। ये जीव को निरंतर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशा में वह समाधि (शांति) को कैसे प्राप्त करे?॥121 (क)॥
    * नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान।
    भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान॥121 ख॥
    भावार्थ:-नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों औषधियाँ हैं, परंतु हे गरुड़जी! उनसे ये रोग नहीं जाते॥121 (ख)॥
    चौपाई :
    * एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी॥
    मानस रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए॥1॥
    भावार्थ:-इस प्रकार जगत्* में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोग के दुःख से और भी दुःखी हो रहे हैं। मैंने ये थो़ड़े से मानस रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परंतु इन्हें जान पाए हैं कोई विरले ही॥1॥
    * जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी॥
    बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे॥2॥
    भावार्थ:-प्राणियों को जलाने वाले ये पापी (रोग) जान लिए जाने से कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परंतु नाश को नहीं प्राप्त होते। विषय रूप कुपथ्य पाकर ये मुनियों के हृदय में भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं॥2॥
    * राम कृपाँ नासहिं सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संजोगा॥
    सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा॥3॥
    भावार्थ:-यदि श्री रामजी की कृपा से इस प्रकार का संयोग बन जाए तो ये सब रोग नष्ट हो जाएँ। सद्गुरु रूपी वैद्य के वचन में विश्वास हो। विषयों की आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो॥3॥
    Last edited by Gyan100; 14-03-2009 at 04:48 PM.
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    चौपाई :
    * रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी॥
    एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं॥4॥

    भावार्थ:-श्री रघुनाथजी की भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धा से पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवा के साथ लिया जाने वाला मधु आदि) है। इस प्रकार का संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जाएँ, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नों से भी नहीं जाते॥4॥

    * जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई॥
    सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई॥5॥

    भावार्थ:-हे गोसाईं! मन को निरोग हुआ तब जानना चाहिए, जब हृदय में वैराग्य का बल बढ़ जाए, उत्तम बुद्धि रूपी भूख नित नई बढ़ती रहे और विषयों की आशा रूपी दुर्बलता मिट जाए॥5॥

    * बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई॥
    सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद॥6॥
    भावार्थ:-इस प्रकार सब रोगों से छूटकर जब मनुष्य निर्मल ज्ञान रूपी जल में स्नान कर लेता है, तब उसके हृदय में राम भक्ति छा रहती है। शिवजी, ब्रह्माजी, शुकदेवजी, सनकादि और नारद आदि ब्रह्मविचार में परम निपुण जो मुनि हैं,॥6॥

    * सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा॥
    श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं॥7॥
    भावार्थ:-हे पक्षीराज! उन सबका मत यही है कि श्री रामजी के चरणकमलों में प्रेम करना चाहिए। श्रुति, पुराण और सभी ग्रंथ कहते हैं कि श्री रघुनाथजी की भक्ति के बिना सुख नहीं है॥7॥

    * कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा॥
    फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला॥8॥

    भावार्थ:-कछुए की पीठ पर भले ही बाल उग आवें, बाँझ का पुत्र भले ही किसी को मार डाले, आकाश में भले ही अनेकों प्रकार के फूल खिल उठें, परंतु श्री हरि से विमुख होकर जीव सुख नहीं प्राप्त कर सकता॥8॥

    * तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना॥
    अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै॥9॥

    भावार्थ:-मृगतृष्णा के जल को पीने से भले ही प्यास बुझ जाए, खरगोश के सिर पर भले ही सींग निकल आवे, अन्धकार भले ही सूर्य का नाश कर दे, परंतु श्री राम से विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता॥9॥

    * हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई॥10॥
    भावार्थ:-बर्फ से भले ही अग्नि प्रकट हो जाए (ये सब अनहोनी बातें चाहे हो जाएँ), परंतु श्री राम से विमुख होकर कोई भी सुख नहीं पा सकता॥10॥

    दोहा :
    * बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल।
    बिनु हरि भजन न तव तरिअ यह सिद्धांत अपेल॥122 क॥
    भावार्थ:-जल को मथने से भले ही घी उत्पन्न हो जाए और बालू (को पेरने) से भले ही तेल निकल आवे, परंतु श्री हरि के भजन बिना संसार रूपी समुद्र से नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धांत अटल है॥122 (क)॥

    * मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन।
    अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन॥122 ख॥
    भावार्थ:-प्रभु मच्छर को ब्रह्मा कर सकते हैं और ब्रह्मा को मच्छर से भी तुच्छ बना सकते हैं। ऐसा विचार कर चतुर पुरुष सब संदेह त्यागकर श्री रामजी को ही भजते हैं॥122 (ख)॥

    श्लोक :
    * विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।
    हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते॥122 ग॥
    भावार्थ:-मैं आपसे भली-भाँति निश्चित किया हुआ सिद्धांत कहता हूँ- मेरे वचन अन्यथा (मिथ्या) नहीं हैं कि जो मनुष्य श्री हरि का भजन करते हैं, वे अत्यंत दुस्तर संसार सागर को (सहज ही) पार कर जाते हैं॥122 (ग)॥

    चौपाई :
    * कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरूपा॥
    श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी॥1॥
    भावार्थ:-हे नाथ! मैंने श्री हरि का अनुपम चरित्र अपनी बुद्धि के अनुसार कहीं विस्तार से और कहीं संक्षेप से कहा। हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी ! श्रुतियों का यही सिद्धांत है कि सब काम भुलाकर (छोड़कर) श्री रामजी का भजन करना चाहिए॥1॥

    * प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही॥
    तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा॥2॥
    भावार्थ:-प्रभु श्री रघुनाथजी को छो़ड़कर और किसका सेवन (भजन) किया जाए, जिनका मुझ जैसे मूर्ख पर भी ममत्व (स्नेह) है। हे नाथ! आप विज्ञान रूप हैं, आपको मोह नहीं है। आपने तो मुझ पर बड़ी कृपा की है॥2॥
    Last edited by Gyan100; 14-03-2009 at 04:14 PM.
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    श्रीरामायणजी की आरती

    * आरती श्रीरामायणजी की।
    कीरति कलित ललित सिय पी की।।
    गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद।
    बालमीक बिग्यान बिसारद।।
    सुक सनकादि सेष अरु सारद।
    बरनि पवनसुत की*रति नीकी।।
    गावत बेद पुरान अष्टदस।
    छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस।।
    मुनि जन धन संतन को सरबस।
    सार अंस संमत सबही की।।
    गावत संतत संभु भवानी।
    अरु घट संभव मुनि बिग्यानी।।>
    ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी।
    कागभुसुंडि गरुड के ही की।।
    कलिमल हरनि बिषय रस फीकी।
    सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की।।
    दलन रोग भव मूरि अमी की।
    तात मात सब बिधि तुलसी की।।
    आरती श्रीरामायणजी की।
    कीरति कलित ललित सिय पी की।।
    ------जय श्रीरामचंद्रजी की----
    पवनसुत हनुमान की जय
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    शिवजी का विवाह

    दोहा :
    * मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।
    कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥100॥
    भावार्थ:-मुनियों की आज्ञा से शिवजी और पार्वतीजी ने गणेशजी का पूजन किया। मन में देवताओं को अनादि समझकर कोई इस बात को सुनकर शंका न करे (कि गणेशजी तो शिव-पार्वती की संतान हैं, अभी विवाह से पूर्व ही वे कहाँ से आ गए?)॥100॥
    चौपाई :
    * जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई॥
    गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी॥1॥
    भावार्थ:-वेदों में विवाह की जैसी रीति कही गई है, महामुनियों ने वह सभी रीति करवाई। पर्वतराज हिमाचल ने हाथ में कुश लेकर तथा कन्या का हाथ पकड़कर उन्हें भवानी (शिवपत्नी) जानकर शिवजी को समर्पण किया॥1॥
    * पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हियँ हरषे तब सकल सुरेसा॥
    बेदमन्त्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं॥2॥
    भावार्थ:-जब महेश्वर (शिवजी) ने पार्वती का पाणिग्रहण किया, तब (इन्द्रादि) सब देवता हृदय में बड़े ही हर्षित हुए। श्रेष्ठ मुनिगण वेदमंत्रों का उच्चारण करने लगे और देवगण शिवजी का जय-जयकार करने लगे॥2॥
    * बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना॥
    हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू॥3॥
    भावार्थ:-अनेकों प्रकार के बाजे बजने लगे। आकाश से नाना प्रकार के फूलों की वर्षा हुई। शिव-पार्वती का विवाह हो गया। सारे ब्राह्माण्ड में आनंद भर गया॥3॥
    * दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा॥
    अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना॥4॥
    भावार्थ:-दासी, दास, रथ, घोड़े, हाथी, गायें, वस्त्र और मणि आदि अनेक प्रकार की चीजें, अन्न तथा सोने के बर्तन गाड़ियों में लदवाकर दहेज में दिए, जिनका वर्णन नहीं हो सकता॥4॥
    छन्द :
    * दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो।
    का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो॥
    सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो।
    पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो॥
    भावार्थ:-बहुत प्रकार का दहेज देकर, फिर हाथ जोड़कर हिमाचल ने कहा- हे शंकर! आप पूर्णकाम हैं, मैं आपको क्या दे सकता हूँ? (इतना कहकर) वे शिवजी के चरणकमल पकड़कर रह गए। तब कृपा के सागर शिवजी ने अपने ससुर का सभी प्रकार से समाधान किया। फिर प्रेम से परिपूर्ण हृदय मैनाजी ने शिवजी के चरण कमल पकड़े (और कहा-)।
    दोहा :
    * नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु।
    छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु॥101॥
    भावार्थ:-हे नाथ! यह उमा मुझे मेरे प्राणों के समान (प्यारी) है। आप इसे अपने घर की टहलनी बनाइएगा और इसके सब अपराधों को क्षमा करते रहिएगा। अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिए॥101॥
    चौपाई :
    * बहु बिधि संभु सासु समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई॥
    जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही॥1॥
    भावार्थ:-शिवजी ने बहुत तरह से अपनी सास को समझाया। तब वे शिवजी के चरणों में सिर नवाकर घर गईं। फिर माता ने पार्वती को बुला लिया और गोद में बिठाकर यह सुंदर सीख दी-॥1॥
    * करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा॥
    बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी॥2॥
    भावार्थ:-हे पार्वती! तू सदाशिवजी के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है। उनके लिए पति ही देवता है और कोई देवता नहीं है। इस प्रकार की बातें कहते-कहते उनकी आँखों में आँसू भर आए और उन्होंने कन्या को छाती से चिपटा लिया॥2॥
    * कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहूँ सुखु नाहीं॥
    भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी॥3॥
    भावार्थ:-(फिर बोलीं कि) विधाता ने जगत में स्त्री जाति को क्यों पैदा किया? पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता। यों कहती हुई माता प्रेम में अत्यन्त विकल हो गईं, परन्तु कुसमय जानकर (दुःख करने का अवसर न जानकर) उन्होंने धीरज धरा॥3॥
    * पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेमु कछु जाइ न बरना॥
    सब नारिन्ह मिलि भेंटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी॥4॥
    भावार्थ:-मैना बार-बार मिलती हैं और (पार्वती के) चरणों को पकड़कर गिर पड़ती हैं। बड़ा ही प्रेम है, कुछ वर्णन नहीं किया जाता। भवानी सब स्त्रियों से मिल-भेंटकर फिर अपनी माता के हृदय से जा लिपटीं॥4॥
    छन्द :
    * जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं।
    फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं॥
    जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले।
    सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले॥
    भावार्थ:-पार्वतीजी माता से फिर मिलकर चलीं, सब किसी ने उन्हें योग्य आशीर्वाद दिए। पार्वतीजी फिर-फिरकर माता की ओर देखती जाती थीं। तब सखियाँ उन्हें शिवजी के पास ले गईं। महादेवजी सब याचकों को संतुष्ट कर पार्वती के साथ घर (कैलास) को चले। सब देवता प्रसन्न होकर फूलों की वर्षा करने लगे और आकाश में सुंदर नगाड़े बजाने लगे।
    दोहा :
    * चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु।
    बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु॥102॥
    भावार्थ:-तब हिमवान्* अत्यन्त प्रेम से शिवजी को पहुँचाने के लिए साथ चले। वृषकेतु (शिवजी) ने बहुत तरह से उन्हें संतोष कराकर विदा किया॥102॥
    चौपाई :
    * तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई॥
    आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना॥1॥
    भावार्थ:-पर्वतराज हिमाचल तुरंत घर आए और उन्होंने सब पर्वतों और सरोवरों को बुलाया। हिमवान ने आदर, दान, विनय और बहुत सम्मानपूर्वक सबकी विदाई की॥1॥
    * जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए॥
    जगत मातु पितु संभु भवानी। तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी॥2॥
    भावार्थ:-जब शिवजी कैलास पर्वत पर पहुँचे, तब सब देवता अपने-अपने लोकों को चले गए। (तुलसीदासजी कहते हैं कि) पार्वतीजी और शिवजी जगत के माता-पिता हैं, इसलिए मैं उनके श्रृंगार का वर्णन नहीं करता॥2॥
    * करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा॥
    हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ॥3॥
    भावार्थ:-शिव-पार्वती विविध प्रकार के भोग-विलास करते हुए अपने गणों सहित कैलास पर रहने लगे। वे नित्य नए विहार करते थे। इस प्रकार बहुत समय बीत गया॥3॥
    * जब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुरु समर जेहिं मारा॥
    आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना॥4॥
    भावार्थ:-तब छ: मुखवाले पुत्र (स्वामिकार्तिक) का जन्म हुआ, जिन्होंने (बड़े होने पर) युद्ध में तारकासुर को मारा। वेद, शास्त्र और पुराणों में स्वामिकार्तिक के जन्म की कथा प्रसिद्ध है और सारा जगत उसे जानता है॥4॥
    छन्द :
    * जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा।
    तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा॥
    यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।
    कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥
    भावार्थ:-षडानन (स्वामिकार्तिक) के जन्म, कर्म, प्रताप और महान पुरुषार्थ को सारा जगत जानता है, इसलिए मैंने वृषकेतु (शिवजी) के पुत्र का चरित्र संक्षेप में ही कहा है। शिव-पार्वती के विवाह की इस कथा को जो स्त्री-पुरुष कहेंगे और गाएँगे, वे कल्याण के कार्यों और विवाहादि मंगलों में सदा सुख पाएँगे।
    दोहा :
    * चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु।
    बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु॥103॥
    भावार्थ:-गिरिजापति महादेवजी का चरित्र समुद्र के समान (अपार) है, उसका पार वेद भी नहीं पाते। तब अत्यन्त मन्दबुद्धि और गँवार तुलसीदास उसका वर्णन कैसे कर सकता है? ॥103॥
    चौपाई :
    * संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा॥
    बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी॥1॥
    भावार्थ:-शिवजी के रसीले और सुहावने चरित्र को सुनकर मुनि भरद्वाजजी ने बहुत ही सुख पाया। कथा सुनने की उनकी लालसा बहुत बढ़ गई। नेत्रों में जल भर आया तथा रोमावली खड़ी हो गई॥1॥
    * प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी॥
    अहो धन्य तब जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा॥2॥
    भावार्थ:-वे प्रेम में मुग्ध हो गए, मुख से वाणी नहीं निकलती। उनकी यह दशा देखकर ज्ञानी मुनि याज्ञवल्क्य बहुत प्रसन्न हुए (और बोले-) हे मुनीश! अहा हा! तुम्हारा जन्म धन्य है, तुमको गौरीपति शिवजी प्राणों के समान प्रिय हैं॥2॥
    * सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥
    बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥3॥
    भावार्थ:-शिवजी के चरण कमलों में जिनकी प्रीति नहीं है, वे श्री रामचन्द्रजी को स्वप्न में भी अच्छे नहीं लगते। विश्वनाथ श्री शिवजी के चरणों में निष्कपट (विशुद्ध) प्रेम होना यही रामभक्त का लक्षण है॥3॥
    * सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी॥
    पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई॥4॥
    भावार्थ:-शिवजी के समान रघुनाथजी (की भक्ति) का व्रत धारण करने वाला कौन है? जिन्होंने बिना ही पाप के सती जैसी स्त्री को त्याग दिया और प्रतिज्ञा करके श्री रघुनाथजी की भक्ति को दिखा दिया। हे भाई! श्री रामचन्द्रजी को शिवजी के समान और कौन प्यारा है?॥4॥
    दोहा :
    * प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार।
    सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार॥104॥
    भावार्थ:-मैंने पहले ही शिवजी का चरित्र कहकर तुम्हारा भेद समझ लिया। तुम श्री रामचन्द्रजी के पवित्र सेवक हो और समस्त दोषों से रहित हो॥104॥
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  5. #5
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    चौपाई :
    *मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला॥
    सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें॥1॥
    भावार्थ:-मैंने तुम्हारा गुण और शील जान लिया। अब मैं श्री रघुनाथजी की लीला कहता हूँ, सुनो। हे मुनि! सुनो, आज तुम्हारे मिलने से मेरे मन में जो आनंद हुआ है, वह कहा नहीं जा सकता॥1॥
    *राम चरित अति अमित मुनीसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा॥
    तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी॥2॥
    भावार्थ:-हे मुनीश्वर! रामचरित्र अत्यन्त अपार है। सौ करोड़ शेषजी भी उसे नहीं कह सकते। तथापि जैसा मैंने सुना है, वैसा वाणी के स्वामी (प्रेरक) और हाथ में धनुष लिए हुए प्रभु श्री रामचन्द्रजी का स्मरण करके कहता हूँ॥2॥
    *सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी॥
    जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥3॥
    भावार्थ:-सरस्वतीजी कठपुतली के समान हैं और अन्तर्यामी स्वामी श्री रामचन्द्रजी (सूत पकड़कर कठपुतली को नचाने वाले) सूत्रधार हैं। अपना भक्त जानकर जिस कवि पर वे कृपा करते हैं, उसके हृदय रूपी आँगन में सरस्वती को वे नचाया करते हैं॥3॥
    * प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा॥
    परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू॥4॥
    भावार्थ:-उन्हीं कृपालु श्री रघुनाथजी को मैं प्रणाम करता हूँ और उन्हीं के निर्मल गुणों की कथा कहता हूँ। कैलास पर्वतों में श्रेष्ठ और बहुत ही रमणीय है, जहाँ शिव-पार्वतीजी सदा निवास करते हैं॥4॥
    दोहा :
    * सिद्ध तपोधन जोगिजन सुर किंनर मुनिबृंद।
    बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिव सुखकंद॥105॥
    भावार्थ:-सिद्ध, तपस्वी, योगीगण, देवता, किन्नर और मुनियों के समूह उस पर्वत पर रहते हैं। वे सब बड़े पुण्यात्मा हैं और आनंदकन्द श्री महादेवजी की सेवा करते हैं॥105॥
    चौपाई :
    * हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं॥
    तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला॥1॥
    भावार्थ:-जो भगवान विष्णु और महादेवजी से विमुख हैं और जिनकी धर्म में प्रीति नहीं है, वे लोग स्वप्न में भी वहाँ नहीं जा सकते। उस पर्वत पर एक विशाल बरगद का पेड़ है, जो नित्य नवीन और सब काल (छहों ऋतुओं) में सुंदर रहता है॥1॥
    * त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया॥
    एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ॥2॥
    भावार्थ:-वहाँ तीनों प्रकार की (शीतल, मंद और सुगंध) वायु बहती रहती है और उसकी छाया बड़ी ठंडी रहती है। वह शिवजी के विश्राम करने का वृक्ष है, जिसे वेदों ने गाया है। एक बार प्रभु श्री शिवजी उस वृक्ष के नीचे गए और उसे देखकर उनके हृदय में बहुत आनंद हुआ॥2॥
    *निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठे सहजहिं संभु कृपाला॥
    कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा॥3॥
    भावार्थ:-अपने हाथ से बाघम्बर बिछाकर कृपालु शिवजी स्वभाव से ही (बिना किसी खास प्रयोजन के) वहाँ बैठ गए। कुंद के पुष्प, चन्द्रमा और शंख के समान उनका गौर शरीर था। बड़ी लंबी भुजाएँ थीं और वे मुनियों के से (वल्कल) वस्त्र धारण किए हुए थे॥3॥
    * तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना॥
    भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी॥4॥
    भावार्थ:-उनके चरण नए (पूर्ण रूप से खिले हुए) लाल कमल के समान थे, नखों की ज्योति भक्तों के हृदय का अंधकार हरने वाली थी। साँप और भस्म ही उनके भूषण थे और उन त्रिपुरासुर के शत्रु शिवजी का मुख शरद (पूर्णिमा) के चन्द्रमा की शोभा को भी हरने वाला (फीकी करने वाला) था॥4॥
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  6. #6
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    bahut hi achcha thread banaya hai yaar. Superb!!!!!!

    Amritvani hai..........
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  7. #7
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    superb yaar ...simply superb!
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  8. #8
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    bahut hi achcha thread banaya hai yaar. Superb!!!!!!

    Amritvani hai..........
    thanks...............
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  9. #9
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    Nice Sharing Bro..........
    Love the Words
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    Mein bhi hun
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  10. #10
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    Gud one bro....but do u really think anybody will read it all..????
    God is Really Creative....I Mean... Just Luk @ Me ...!!!

  11. #11
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    Gud one bro....but do u really think anybody will read it all..????
    yeah ... may b if u can find it on youtube... its always better to watch then read !

  12. #12
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    thank you for sharing
    i ll take time to read this one

    please post the youtube video


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  13. #13
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    Nice sharing do you have the whole ramcharitmansa translated in this manner

  14. #14
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    superb yaar ...simply superb!
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    Nice Sharing Bro..........
    thanks...............
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  15. #15
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