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Thread: एवैं कुछ भी :जेब काटने पर असहनशीलता का 'माल्&#

  1. #721
    teekhi jammu chilli Major General arumita's Avatar
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    पाक में बहस, पठानकोट में कौन कांड कर आया?

    पाकिस्तान लाहौर में सवर्दलीय वार्ता चल रही थी, वहां के सारे आतंकी संगठन (आईएसआई, पाक सेना समेत) मौजूद थे- तैश-ए-तस्कर, लश्कर-ए-बम, हाफिज बमबाज, मौलाना बोम्बाना और भी बदमाश संगठन और पीएम शरीफ के प्रतिनिधि। बात शुरू हुई-

    पीएम शरीफ के प्रतिनिधि- पठानकोट में कौन कांड कर आया, हां तैश-ए-तस्करवालो, तुम कर आए क्या?
    तैश-ए-तस्कर प्रतिनिधि- ना, मुझे तो पाक सेना ने अफगानिस्तान भेजा हुआ था, मैं तो वहां इंडियन एंबेसी में बम लगा रहा था। बहुत काम हो गया है बमबाजी का।
    पीएम शरीफ के प्रतिनिधि- क्यों भई लश्कर-ए-बमवालो, तुम गए थे क्या पठानकोट?

    लश्कर-ए-बम प्रतिनिधि- ना मेरी तो परमानेंट पोस्टिंग कश्मीर में है। वहां बम लगाने से फुरसत मिले, तो कहीं और जाऊं। पूरी दुनिया में पाकिस्तानी बमबाज बुलाए जा रहे हैं। यू नो, पाकिस्तान आतंक की इंडस्ट्री में इतने सस्ते रेट देता है कि समझो आतंक के चाइना रेट हैं ये। बहुत सस्ते में। सिर्फ खाने भर को मिल जाए, तो पाकिस्तानी आतंकी बम लगा देगा कहीं भी।
    वर्ल्ड आतंक मार्केट में पाकिस्तान की ऐसी गुडविल बनाने के लिए सेना, आईएसआई और शरीफ साहब का शुक्रिया। आपकी दुआओं से पाकिस्तानियों में राष्ट्रीय एकता हो गई है। पाक का अनपढ़ बंदा बम लगाने के रोजगार में है, पाकिस्तान का पढ़ा-लिखा इंजीनियर बम बनाने के रोजगार में है। पाकिस्तान के स्कूल बम झेलने के रोजगार में हैं। पाकिस्तान के हर शहर के अस्पताल-डॉक्टर बमों से घायलों को बचाने के रोजगार में हैं। पाकिस्तान के पीएम, मंत्री सुबह से शाम तक इन बयानों के रोजगार में हैं कि वे वाले, ये वाले और वे-वे वाले बम हमारे नहीं हैं। कसम से बमों ने पाकिस्तान में सबको रोजगार दिया हुआ है, बमों ने सारे पाकिस्तानियों को एक कर दिया है।

    आईएसआई प्रतिनिधि- पर भाइयो, इन दिनों पाक में फुटकर-फ्रीलांस आतंकी हो गए हैं, जो जेनुअन आतंकवादी नहीं हैं, ऐसे ही शौक-हॉबी के लिए आतंकी हैं।
    तैश-ए-तस्कर प्रतिनिधि- ये जेनुइन आतंकवादी क्या होते हैं?

    पाक सेना प्रतिनिधि- जैसे हम हैं, वर्दी में, मेजर, ब्रिगेडियर पोस्टवाले। चलो हम सारे आतंकियों को एक हेडक्वॉर्टर बना लेना चाहिए।

    सबसे बड़ेवाले हम हैं, इसलिए हम ही हेडक्वॉर्टर होंगे। पाक सेना, आईएसआई, लश्कर-ए-बम और तैश-ए-तस्कर में बहस चल निकली है।

    कौन बड़ा वाला है, यह फैसला करने अल-कायदा नेटवर्क के लोग आएंगे।

    My love, the spark that ignited the day we met
    remains an eternal flame.











  2. #722
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    अब ऑड-ईवन से जीवन की हर समस्या का हल

    2016 में आम आदमी (आम-आदमी पार्टीवाला नहीं) के साथ गुगली होनेवाली है। होनेवाली क्या है, हो गई। उन्हे देश ने वोट दिया था कि देश की समस्याएं हल करने को, वो क्रिकेट से जुड़े नए सवाल खड़े करते पाए गए। जिन्हें दिल्ली ने वोट दिया दिल्ली साफ करने के लिए, वह क्रिकेट के कचरे में ही अपना भविष्य देख रहे हैं, शहर का कचरा अलबत्ता वैसा ही है। कुल कहानी यह कि बंदा क्रिकेट, आयोग, मारधाड़, आईपीएल, फिक्सिंग, बीसीसीआई, डीडीसीए, डांस में ध्यान लगा ले, तो फिर कोई चिंता ना व्यापती। बंदा क्रिकेटमय होते ही परेशानी-प्रूफ हो जाता है।

    उन्होंने बताया था- महंगाई कम करेंगे, पर अरहर-दाल दो सौ रुपये के पार चली गई, उस गेंद की तरह से जिसे टॉप बल्लेबाज स्टेडियम से नहीं, शहर के बाहर ही शॉट लगाकर फेंक देता है। जमाखोरों से ज्यादा सुपर-हिटबाज बल्लेबाज कहीं भी ना मिलने के। उन्होने बताया था- दिल्ली में महिला-सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे लगाएंगे, पर दुनिया की टॉप क्लास दूरबीन से देखने पर भी ये सीसीटीवी कैमरे दिल्ली में दिखाई ना दे रहे।

    क्रिकेट में ध्यान लगाने का एक फायदा यह भी है कि क्रिकेट में ही इतनी समस्याएं दिखने लग जाती हैं कि फिर बाकी की तरफ ध्यान ही ना जा सकता। वैसे अब धीमे-धीमे हर प्रॉब्लम का हल ऑड-ईवन के रास्ते मिलेगा। कांग्रेस संसद के अगले सत्र में एक दिन जीएसटी पर हल्ला काटेगी, दूसरे ऑड दिन किसी साध्वी-साधु के बयान पर। बीजेपी के कोई साधुजी एक दिन कोई परम बेवकूफाना बयान देंगे, दूसरे ऑड दिन कोई साध्वीजी चिरकुटई बिखेरेंगी। आम आदमी पार्टी ईवन दिन में मोदी का इस्तीफा मांगेगी, और ऑड दिन में जेटली का। आम आदमी एक दिन अपनी बदहाली का जिम्मेदार बॉस को मानेगा और दूसरे ऑड दिन बीवी को। आम आदमी की बीवी एक दिन अपनी बदहाली की जिम्मेदारी नसीब पर डालेगी और दूसरे ऑड दिन पति पर।

    इस ऑड-ईवन हल से हम जीवन की हर समस्या हल कर सकते हैं। दिल्लीवाले तो फुलटू तैयार हो गए हैं, एक दिन गुगली केजरीवाल की तरफ से आएगी और अगले ऑड दिन में केंद्र सरकार परेशान करेगी। जवाब ना तलाशिएगा, सिर्फ सवालों-बवालों की चौतरफा सप्लाई की गैरंटी है ऑड-ईवन तारीखों पर।

    डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं
    ╰დ╮LovEPOWER ╭დ╯

  3. #723
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    you are right...........


  4. #724
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    you are right...........

    Thanks for liking.......

  5. #725
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    कूड़ा दिल्ली की ही नहीं, जीवन की सचाई भी है

    आपने देखे होंगे अपने आसपास बहुत ही गंदे टाइप के लोग, जो दूसरों को स्मार्ट होने या ना होने का सर्टिफिकेट बांटते रहते हैं। दिल्ली शहर का हाल कुछ ऐसा ही है। यह शहर गंदा रहता है, पर पूरे देश में कौन सा शहर स्मार्ट होगा या नहीं होगा, इसका फैसला यहीं होता है।

    दिल्ली कुछेक हफ्तों में किसी न किसी कूड़ा-कांड से मुखातिब हो जाती है। केजरीवाल जी कहते हैं कि यह सब केंद्र सरकार करा रही है, केंद्र वाले कहते हैं कि कूड़ा खालिस देहलवी है।



    एनसीआर के कई शहरों में, लखनऊ और कानपुर में भी कूड़ा होता है। पर साहब वैरायटी-वैरायटी का मामला है। लखनऊ में कूड़ा सफाईकर्मियों के निकम्मेपन का रिजल्ट हो सकता है, दिल्ली में कूड़ा सफाई कर्मियों की सैलरी-विहीनता का परिणाम है। लखनऊ वाले अपने कूड़े की क्वॉलिटी पर फख्र कर सकते हैं कि ऐसे ही नहीं है, सारे एम्पलाई को सैलरी देने का बाद ही नसीब हुआ है, यह कूड़ा। ऐसा फख्र दिल्ली वालों को नसीब नहीं है।

    खैर, कूड़ा फेस्टिवल हर दो-एक महीने पर दिल्ली में हो जाता है, पर इसका कायदे से सेलिब्रेशन नहीं हो पाता। फिल्म इंडस्ट्री के कुछ कलाकारों को इसकी हाइप क्रिएट करने के लिए बुलाना चाहिए। मेरी पहली पसंद वे अभिनेता हैं जो कमाल का कूड़ा-अभिनय करते हैं लेकिन उस पर उन्हें तनिक भी मलाल नहीं होता। ऐसे लोग लगातार बुलाए जाने चाहिए, जिनसे किए जाने वाले हर सवाल का जवाब एक ही हो- कूड़ा। आप क्या हैं, आप क्या करते हैं, आपके जीवन का लक्ष्य क्या है-कूड़ा, कूड़ा, कूड़ा।

    इसी तरह कूड़ा डिजाइन महोत्सव हो- जिसमें तमाम सड़कों पर बिखरे कूड़े के बीच कीचड़ से छपाछप निकलते वाहन ऐसे दिखें कि वे दिल्लीवासियों की प्रतिबद्धता को दिखाएं। इसी तरह अगर आप कहीं जाने को प्रतिबद्ध हों, तो किसी भी किस्म का कूड़ा आपको रोक नहीं सकता- यह भी प्रदर्शित हो। ऐसा कूड़ा भी दिखाया जाए, जो अकसर नेताओं की शक्ल में पाया जाता है।

    कूड़ा दर्शन फेस्टिवल में वक्ता बताएं कि कूड़ा दिल्ली की ही सचाई नहीं है, पूरे जीवन की सचाई है। हर पति अपनी पत्नी की निगाह में यही है।
    कूड़ा इंस्टालेशन कला का प्रदर्शन अब दिल्ली में नियमित कूड़ेबाजी में संभव है। जनवरी में कूड़े का जो ढेर दस फुट का था, उस पर दिसंबर तक 20 हजार फुट का इंस्टालेशन जमाया जा सकता है।

    कूड़े के अच्छे दिन, परमानेंटली दिल्ली में आ ही गए हैं।

  6. #726
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    कूड़ा दिल्ली की ही नहीं, जीवन की सचाई भी है

    आपने देखे होंगे अपने आसपास बहुत ही गंदे टाइप के लोग, जो दूसरों को स्मार्ट होने या ना होने का सर्टिफिकेट बांटते रहते हैं। दिल्ली शहर का हाल कुछ ऐसा ही है। यह शहर गंदा रहता है, पर पूरे देश में कौन सा शहर स्मार्ट होगा या नहीं होगा, इसका फैसला यहीं होता है।

    दिल्ली कुछेक हफ्तों में किसी न किसी कूड़ा-कांड से मुखातिब हो जाती है। केजरीवाल जी कहते हैं कि यह सब केंद्र सरकार करा रही है, केंद्र वाले कहते हैं कि कूड़ा खालिस देहलवी है।



    एनसीआर के कई शहरों में, लखनऊ और कानपुर में भी कूड़ा होता है। पर साहब वैरायटी-वैरायटी का मामला है। लखनऊ में कूड़ा सफाईकर्मियों के निकम्मेपन का रिजल्ट हो सकता है, दिल्ली में कूड़ा सफाई कर्मियों की सैलरी-विहीनता का परिणाम है। लखनऊ वाले अपने कूड़े की क्वॉलिटी पर फख्र कर सकते हैं कि ऐसे ही नहीं है, सारे एम्पलाई को सैलरी देने का बाद ही नसीब हुआ है, यह कूड़ा। ऐसा फख्र दिल्ली वालों को नसीब नहीं है।

    खैर, कूड़ा फेस्टिवल हर दो-एक महीने पर दिल्ली में हो जाता है, पर इसका कायदे से सेलिब्रेशन नहीं हो पाता। फिल्म इंडस्ट्री के कुछ कलाकारों को इसकी हाइप क्रिएट करने के लिए बुलाना चाहिए। मेरी पहली पसंद वे अभिनेता हैं जो कमाल का कूड़ा-अभिनय करते हैं लेकिन उस पर उन्हें तनिक भी मलाल नहीं होता। ऐसे लोग लगातार बुलाए जाने चाहिए, जिनसे किए जाने वाले हर सवाल का जवाब एक ही हो- कूड़ा। आप क्या हैं, आप क्या करते हैं, आपके जीवन का लक्ष्य क्या है-कूड़ा, कूड़ा, कूड़ा।

    इसी तरह कूड़ा डिजाइन महोत्सव हो- जिसमें तमाम सड़कों पर बिखरे कूड़े के बीच कीचड़ से छपाछप निकलते वाहन ऐसे दिखें कि वे दिल्लीवासियों की प्रतिबद्धता को दिखाएं। इसी तरह अगर आप कहीं जाने को प्रतिबद्ध हों, तो किसी भी किस्म का कूड़ा आपको रोक नहीं सकता- यह भी प्रदर्शित हो। ऐसा कूड़ा भी दिखाया जाए, जो अकसर नेताओं की शक्ल में पाया जाता है।

    कूड़ा दर्शन फेस्टिवल में वक्ता बताएं कि कूड़ा दिल्ली की ही सचाई नहीं है, पूरे जीवन की सचाई है। हर पति अपनी पत्नी की निगाह में यही है।
    कूड़ा इंस्टालेशन कला का प्रदर्शन अब दिल्ली में नियमित कूड़ेबाजी में संभव है। जनवरी में कूड़े का जो ढेर दस फुट का था, उस पर दिसंबर तक 20 हजार फुट का इंस्टालेशन जमाया जा सकता है।

    कूड़े के अच्छे दिन, परमानेंटली दिल्ली में आ ही गए हैं।

  7. #727
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    इश्क मुश्किल है साहब ....

    दिल्ली में लोग उम्मीद कर रहे थे कि तमाम इलाकों में सेफ्टी के लिए सीसीटीवी कैमरे आएंगे। कैमरे नहीं आए, पर ऑड-ईवन स्कीम दोबारा आने की तारीख आ गई। कमाल की स्कीम है, इसकी डिबेट में उलझी पब्लिक केजरीवाल जी के बाकी वादे भूल जाती है कि कितने सीसीटीवी कैमरे लगने थे, कितने नए कॉलेज खुलने थे, कितने नए स्कूल खुलने थे।

    वैसे सीसीटीवी कैमरों का दिल्ली में व्यापक तौर पर न लगना भी दिल्ली सरकार की तरफ से प्रेमीजनों को गिफ्ट ही माना जा सकता है, चोरों-उठाईगीरों के लिए भी। प्रेमीजन और चोर-उठाईगीर मौका-मुकाम देखकर जब चाहे वारदात कर सकते हैं, बगैर कैमरे की चिंता किए।

    14 फरवरी वैलंटाइन्स-डे हर साल ईवन डे पर ही पड़ेगा, दिल्ली के ईवन नंबर के वाहन वाले वैलंटाइन पर्मानेंटली खुश रह सकते हैं। ऑड वाहन वालों की किस्मत वैलंटाइन्स डे पर दिल्ली में ऑड ही रहने वाली है। वैसे फेसबुक के लव पर हुए शोध से पता चला है कि सबसे ज्यादा ऑड किस्मत फेसबुक के लवर लोगों की ही है, ऑड दिनों में भी, ईवन दिनों में भी।
    ये इश्क नहीं है आसां – जिसने कहा था, उसने फेसबुक इश्क को देखे-समझे बगैर कहा था। फेसबुक इश्क तो असंभव है, इसलिए जो फेसबुक लव पहले एक दिन की लंबी अवधि तक चल जाता था, अब आधे दिन से ज्यादा नहीं चल पाता।

    आफतें कई हैं, लवर लोग बताते हैं कि गर्लफ्रेंड अपनी हर फोटू पर सिर्फ लाइक नहीं चाहती, लंबे कॉमेंट मांगती है। अब लिखने काबिल पढ़े-लिखे होते, तो फेसबुक पर टाइम गला रहे होते क्या? बात में दम है।

    एक और फेसबुक लवर ने बताया- पता नहीं कौन-सा ट्रैकर है, जो यह ट्रैक करके गर्लफ्रेंड को बता देता है कि मैं फेसबुक पर हूं, फिर चुपके से बिना कॉमेंट के निकल नहीं सकते। फेसबुक पर हैं और गर्लफ्रेंड द्वारा डाली गई अरहर की फोटू पर लंबे लाइकशुदा कॉमेंट ना करने का मतलब कुछ यूं है, जैसे हाफिज सईद, लश्कर-ए-तैबा होकर आतंक ना मचाना। हालांकि, अरहर की दाल पर तो अब हर हाल में लाइक करना बनता है।

    खैर, इश्क मुश्किल है साहब और फेसबुक इश्क-इम्पॉसिबल है, किसी भी फेसबुक आशिक से कन्फर्म कर लीजिए।
    ╰დ╮LovEPOWER ╭დ╯

  8. #728
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    Red face

    कैशलेस के चक्कर



    जेबकतरे परेशान हैं, पब्लिक की जेब से कैश गायब हो रहा है, कार्ड आ गए हैं- डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, 10 रुपये तक का ऑनलाइन ट्रांसफर भी है। पर कार्डों से रकम निकालने के लिए पिन-पासवर्ड जरूरी है, जो सच्चा प्यार करनेवाले तक एक-दूसरे को नहीं बताते। इतिहास बताता है कि पिन-पासवर्ड मजनू ने लैला को ना बताया, रोमियो ने जूलियट को ना बताया। शाहजहां ने शायद मुमताज को बताया, तभी उसकी इतनी रकम खर्च हो ली कि बेटे औरंगजेब ने डांटकर बाप को कैद कर दिया कि बहुत फिजूलखर्ची मचा ली तुमने।

    इतनी ट्रेनिंग, रिस्क लेकर जेबकतरे जेब काट रहे हैं और निकल क्या रहे हैं- कार्ड। वे परेशान हैं, पर परेशान छोटे जेबकतरे ही हैं, क्योंकि बड़े जेबकतरे ग्लोबल स्केल पर ऑपरेट करते हैं। इंडिया में चीख-पुकार मचे, तो ब्रिटेन से स्विट्जरलैंड तक जा सकते हैं। छोटों की आफत यह है कि उन्हें मेट्रो में और बसों में ऑपरेट करना होता है।



    बजट का भी यही उद्देश्य है कि पब्लिक कैश का इस्तेमाल कम करे, ऑनलाइन, कार्डों के जरिए ज्यादा काम चले। मरण छोटे जेबकतरों का ही है, उनकी तो डीलिंग कैश में ही है। बड़े वालों की डीलिंग कैश से नहीं, बैंक-ट्रांजैक्शन से होती है। बैंक से लोन लिया, हॉट कैलेंडरों और कूल पार्टियों में उड़ा दिया, वापस नहीं किया। बहुत हैं, जिन्होंने एक जेब नहीं कतरी कभी, पूरा मुल्क ही कतर लिया है। इनमें से कइयों के स्विस-खातों में कैश लेस इंतजाम हैं।

    मेरी चिंता दूसरी भी है। कैश लेस ट्रांजैक्शन हों, सब ऑनलाइन हो, इसके चक्कर में हमारी कई फिल्मों के डायलॉग, प्लॉट चौपट हो लेंगे। नए बच्चों को समझ ही नहीं आएगा कि स्टोरी, डायलॉग, प्लॉट का अर्थ क्या है। ‘दीवार’ में अमिताभ बच्चन का ऐतिहासिक डायलॉग है-‘मैं फेंके हुए पैसे नहीं उठाता।’ इस फिल्म के सीक्वल में यह डायलॉग सुनकर इफ्तिखार कह सकते हैं-‘पैसे फेंकने की जरूरत खत्म हो गई है विजय, मैंने पहले ही तुम्हारे खाते में ऑनलाइन ट्रांसफर कर दिए थे। विजय तुम अपडेट नहीं हो रहे हो, पुरानी टेकनीक से नई स्मगलिंग नहीं हो सकती। तुम अपने बैंक खातों को ऑनलाइन चेक नहीं करोगे, तो बताओ स्मगलिंग के नए ऑनलाइन मेसेज कैसे देखोगे? तुम कैसे करोगे विजय, कैसे करोगे? स्मगलिंग के तुम्हारे करियर में बहुत टेक्निकल लोचा दिख रहा है। तुम्हें पता होना चाहिए कि इंटरनेट पर हम यह भी चेक कर सकते हैं कि सोना सस्ता कहां मिलेगा, दुबई में या न्यूयार्क में। बहुत कॉम्पिटिशन है विजय। हमें कॉस्ट-इफेक्टिव स्मगलर होना है, कॉस्ट-इफेक्टिव। मुझे चिंता हो रही है विजय, टेक्निकल-अनपढ़ता तुम्हें कामयाब स्मगलर नहीं बनने देगी।



    ‘कुली’ में अमिताभ का ही एक हिट डायलॉग है-‘मजदूर का पसीना सूखने से पहले, उसकी मजदूरी मिल जानी चाहिए जनाब।’ यह तो पूरा डायलॉग ही उखड़ गया है। रेल बजट ने कुली को सहायक घोषित कर दिया है। सहायक को मजदूरी नहीं सैलरी या फीस देने का चलन है। उफ्फ कितना बेअसर होगा यह डायलॉग-‘सहायक को उसकी फीस उसकी सेवाओं की सप्लाई के फौरन बाद मिल जानी चाहिए।’

    कुमार की एक पुरानी फिल्म में वह मधुबाला के साथ गाना गाते दीखते हैं, जिसका आशय है कि पांच रुपये बारह आना का भुगतान उन्हें कर दिया जाए, वरना उनके बड़े भाई उनकी पिटाई करेंगे। इस भुगतान के लिए अब यह बहाना चल नहीं सकता कि खुले नहीं हैं। ऐसे-ऐसे मोबाइल ऐप्लिकेशन आ गए हैं, जो 4 रुपये 37 पैसे तक का ट्रांसफर एक झटके में कर सकते हैं।

    बैंकिंग, फाइनैंस के नए मोबाइल ऐप्लिकेशन विकसित करने वालों ने रोमांस की कई संभावनाओं को एक झटके में खत्म कर दिया है। जो अमाउंट चाहिए, ट्रांसफर कीजिए, कैश-लेस। खैर, बंदा अगर कैश-लेस हो तो स्विस खातों वाला कैश-लैस हो, बाकी के कैश-लैसपने में थोड़ी सुविधा जरूर है, असली मजा ढेले भर का भी नहीं।
    ╰დ╮LovEPOWER ╭დ╯

  9. #729
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    जेब काटने पर असहनशीलता का 'माल्याकरण'

    दिवंगत ऐक्टर राजकुमार की शैली में एक डायलॉग बनता है, जब माल्या किसी बैंक के चेयरमैन से कह रहे हैं- जानी, खुद दारू पीकर घर तबाह तो कोई भी कर सकता है, पर दारू बना-बेच-पिलाकर भी तबाह होने के लिए बंदे को माल्या होना पड़ता है।

    माल्या कह सकते हैं कि उनसे लोन की वापसी की मांग असहनशीलता है। जो बैंक बरसों-बरस दूसरों को मोटी रकम दबाने का मौका देते रहे, वही बैंक 8000-10000 करोड़ की रकम उनसे वापस मांगें, यह तो असहनशीलता है।

    असहनशीलता का माल्याकरण हो रहा है।

    कल एक रहजन ने चाकू दिखाकर मेरा पर्स रखवाया, मेरे भुनभुनाने पर वह बोला- माल्या ले गए करोड़ों तब तो आप कुछ ना बोले, मुझे देने में आप असहनशीलता दिखा रहे हैं।

    मेरे एक मित्र ने शिकायत की कि दिल्ली में जिस जगह जाने के लिए मीटर से 100 रुपये बनते हैं, वहां जाने के लिए दिल्ली के ऑटो वाले 300 मांग लेते हैं।

    मैंने कहा, 300 रुपये ना देने को असहनशीलता भी घोषित किया जा सकता है। वक्त बहुत ही असहनशील हो चला है। हम सबको सहनशील होना पड़ेगा- माल्या से लेकर ऑटो वाले तक को।

    असहनशीलता की आंधी में दिल्ली की सड़कों पर छेड़क लड़कियों को छेड़ेंगे, और छेड़खानी में प्रतिरोध आने पर छेड़क कहेंगे- यूपी में तो कई लड़कियां हर वारदात पर शांत रहती हैं, तुम छेड़खानी पर पुलिस-रिपोर्ट की धमकी दे रही हो, बहुत असहनशील हो तुम।

    कोई जेबकट-छेड़क कुछ पढ़-लिख ले, तो फिर कुछ भी जस्टिफाइ करने के तथ्य-तर्क जुटा लेता है। माल्या यह भी कह सकते हैं कि समानता का अधिकार तब ही माना जाएगा, जब हर कारोबार की कंपनी बैंकों को समान रूप से चूना लगा पाए। माइनिंग कंपनियां, स्टील कंपनियां, फाइनैंस कंपनियां चूना लगा चुकी हैं, हवाई जहाज कंपनियों का भी तो कुछ हक बनता था, वह हक मैंने हासिल कर लिया। इस हक के खिलाफ कोई कुछ बोले, तो इसे असहनशीलता ही माना जाएगा।

    सोच रहा हूं कि अब बस, मेट्रो में चलते हुए खुद ही पूछ लिया करूं- कोई भाई जेबकतरा हो तो बता दे, यह मेरा पर्स है। आप जेब काटने की जहमत करेंगे, तो आपके प्रति मेरी असहनशीलता हो जाएगी।

    ╰დ╮LovEPOWER ╭დ╯

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