हर हर महादेव...................
हर हर महादेव...................
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महाकाल के दरबार में महाकाल का सच्चा भक्त |
हर-हर महादेव....जय महाकाल |
Last edited by rajpaldular; 01-12-2012 at 02:03 PM.
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कहते है जोडियाँ ऊपरवाला बनाता है,
पर ऊपरवाले की जोड़ी कौन बनाता होगा,
यह शायद ही किसी ने सोचा हो.
विधाता के खेल भी बड़े निराले हैं,
... वह खुद ही रचनाकार भी है,
और खुद ही एक अनुपम रचना भी.
वही सारी कथाएं लिखता है,
वही उन कथाओं का प्रधान किरदार भी बनता है.
यह हम इन्सानों की अनभिज्ञता होती है कि हम उसके असली स्वरुप को पहचान नहीं पाते.
कारण,
हमारी आँखों पर सांसारिक माया के पर्दे पड़े होते हैं.
ऐसी ही एक अनभिज्ञता ने गिरिराज हिमालय कि पत्नी मैना को भी घेर लिया था,
जब उन्होंने देव-ऋषि- गन्धर्वों के अतिरिक्त भूत-पिशाच और नागों की विशाल संख्या को पुत्री पार्वती से ब्याह करने आये भगवान् शंकर की बारात में नाचते गाते देखा.
ऐसा अनोखा दूल्हा,
ऐसी अनोखी बारात- न कभी किसी ने देखी थी,
न सुनी थी.
जिसके परिणाम- स्वरुप,
माता मैना ने अपनी कन्या का विवाह करने से इन्कार कर दिया.
पर,देवर्षि नारद के रहते हुए भला कौन और कब तक भ्रम के भंवर में डूबा रह सकता है?
उन्होंने उन्हें इस आदि-युगल के वास्तविक स्वरुप के दर्शन कराये और उस सुखद घटना को साकार किया,
जिसकी आस देवगण सहस्त्र वर्षों से लगाए हुए थे.
चले महेश्वर दूल्हा बनकर
कर अद्भुत श्रृंगार,
शिवजी तो आये हैं माता मैना के द्वार.
आई शुभ मंगल-बेला ,
परछन की जानकर,
सखियों संग मैना आयीं,
शिवजी का ध्यानकर.
सोने के थाल में थी,
मंगलमय आरती,
वेश अनोखा देख,
भय से पुकारतीं-
"ऐसे वर से व्याह न होगा,
सुन ले जग संसार".
शिवजी तो आये हैं माता मैना के द्वार............
बेटी सुकुमार मेरी,
पाया वरदान में,
ना दूँगी जोगी को मैं,
धन अपना दान में.
कैसी विधाता ने जोड़ी बना दी ! जाने किस कर्म की ऐसी सजा दी.
देवमुनि नारद समझायें,
महिमा अपरम्पार.
शिवजी तो आये हैं माता मैना के द्वार............
आदि अनंत काल का है ये नाता,
इनके आगे
नतमस्तक, देवि ! विधाता.
करते हैं रचना दोनों,
मिलकर संसार की, इनसे ही सृष्टि सारी,
मूरत हैं प्यार की. शंका छोड़ो ब्याह रचाओ,
करने जग- उद्धार.
शिवजी तो आये हैं माता मैना के द्वार............
श्री सोमनाथ
सोमनाथ मंदिर एक महत्वपूर्ण हिन्दू मंदिर है जिसकी गिनती १२ ज्योतिर्लिंगों में होती है । गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि इसका निर्माण स्वयं चन्द्रदेव ने किया था । इसका उल्लेख ऋग्वेद में भी मिलता है । इसे अब तक १७ बार नष्ट किया गया है और हर बार इसका पुनर्निर्माण किया गया ।
... सोमनाथ का बारह ज्योतिर्लिगों में सबसे प्रमुख स्थान है। सोमनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक व पर्यटन स्थल है। मंदिर प्रांगण में रात साढे सात से साढे आठ बजे तक एक घंटे का साउंड एंड लाइट शो चलता है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के इतिहास का बडा ही सुंदर सचित्र वर्णन किया जाता है। लोककथाओं के अनुसार यहीं श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। इस कारण इस क्षेत्र का और भी महत्व बढ गया। ऐसी मान्यता है कि श्रीकृष्ण भालुका तीर्थ पर विश्राम कर रहे थे। तब ही शिकारी ने उनके पैर के तलुए में पद्मचिन्ह को हिरण की आंख जानकर धोखे में तीर मारा था। तब ही कृष्ण ने देह त्यागकर यहीं से वैकुंठ गमन किया। इस स्थान पर बडा ही सुन्दर कृष्ण मंदिर बना हुआ है।
सागर तट से मंदिर का दृश्य सर्वप्रथम एक मंदिर ईसा के पूर्व में अस्तित्व में था जिस जगह पर द्वितीय बार मंदिर का पुनर्निर्माण सातवीं सदी में वल्लभी के मैत्रक राजाओं ने किया । आठवीं सदी में सिन्ध के अरबी गवर्नर जुनायद ने इसे नष्ट करने के लिए अपनी सेना भेजी । प्रतिहार राजा नागभट्ट ने 815 ईस्वी में इसका तीसरी बार पुनर्निर्माण किया । इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी । अरब यात्री अल-बरुनी ने अपने यात्रा वृतान्त में इसका विवरण लिखा जिससे प्रभावित हो महमूद ग़ज़नवी ने सन १०२४ में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया, उसकी सम्पत्ति लूटी और उसे नष्ट कर दिया ।
१०२४ के डिसम्बर महिनेमें मुहमद गजनवीने कुछ ५,००० साथीयोंके साथ लूट चलाकर स्वम इस मंदिर के लिंग के नाश करनेमें महत्व का भाग लिया। ५०,००० लोग मंदिर के अंदर हाथ जोडकर पूजा अर्चना कर रहे थे ,प्रायः सभी कत्ल कर दिये गये।[1][2]
इसके बाद गुजरात के राजा भीम और मालवा के राजा भोज ने इसका पुनर्निर्माण कराया । सन 1297 में जब दिल्ली सल्तनत ने गुजरात पर क़ब्ज़ा किया तो इसे पाँचवीं बार गिराया गया । मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसे पुनः 1706 में गिरा दिया । इस समय जो मंदिर खड़ा है उसे भारत के गृह मन्त्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने बनवाया और पहली दिसंबर 1995 को भारत के राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया ।
१९४८ में प्रभासतीर्थ प्रभास पाटण के नाम से जाना जाता था। इसी नाम से इसकी तहसील और नगर पालिका थी। यह जूनागढ रियासत का मुख्य नगर था। लेकिन १९४८ के बाद इसकी तहसील, नगर पालिका और तहसील कचहरी का वेरावल में विलय हो गया। मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा। लेकिन सन १०२६ में महमूद गजनी ने जो शिवलिंग खंडित किया, वह यही आदि शिवलिंग था। इसके बाद प्रतिष्ठित किए गए शिवलिंग को १३०० में अलाउद्दीन की सेना ने खंडित किया। इसके बाद कई बार मंदिर और शिवलिंग खंडित किया गया। बताया जाता है आगरा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के हैं। महमूद गजनी सन १०२६ में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था। सोमनाथ मंदिर के मूल मंदिर स्थल पर मंदिर ट्रस्ट द्वारा निर्मित नवीन मंदिर स्थापित है। राजा कुमार पाल द्वारा इसी स्थान पर अन्तिम मंदिर बनवाया गया था। सौराष्ट्र के मुख्यमन्त्री उच्छंगराय नवल शंकर ढेबर ने १९ अप्रैल १९४० को यहां उत्खनन कराया था। इसके बाद भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्मशिला पर शिव का ज्योतिर्लिग स्थापित किया है। सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने ८ मई १९५० को मंदिर की आधार शिला रखी तथा ११ मई १९५१ को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिग स्थापित किया। नवीन सोमनाथ मंदिर १९६२ में पूर्ण निर्मित हो गया। १९७० में जामनगर की राजमाता ने अपने स्वर्गीय पति की स्मृति में उनके नाम से दिग्विजय द्वार बनवाया। इस द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व गृहमन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा है। सोमनाथ मंदिर निर्माण में पटेल का बडा योगदान रहा। मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ है। उसके ऊपर एक तीर रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है। मंदिर के पृष्ठ भाग में स्थित प्राचीन मंदिर के विषय में मान्यता है कि यह पार्वती जी का मंदिर है। सोमनाथजी के मंदिर की व्यवस्था और संचालन का कार्य सोमनाथ ट्रस्ट के अधीन है। सरकार ने ट्रस्ट को जमीन, बाग-बगीचे देकर आय का प्रबंध किया है। यह तीर्थ पितृगणों के श्राद्ध, नारायण बलि आदि कर्मो के लिए भी प्रसिद्ध है। चैत्र, भाद्र, कार्तिक माह में यहां श्राद्ध करने का विशेष महत्व बताया गया है। इन तीन महीनों में यहां श्रद्धालुओं की बडी भीड लगती है। इसके अलावा यहां तीन नदियों हिरण, कपिला और सरस्वती का महासंगम होता है। इस त्रिवेणी स्नान का विशेष महत्व है।
श्री नागेश्वर ज्योत्रिलिंग
भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक नागेश्वर ज्योतिर्लिंग है. यह ज्योतिर्लिंग भारत के गुजरात राज्य के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है. धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है. तथा नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है. भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है. द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिग की दूरी 17 मील की है. इस ज्योतिर्लिंग की शास्त्र...ों में अद्वभुत महिमा कही गई है.
इस ज्योतिर्लिग की महिमा में कहा गया है, कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्वा और विश्वास के साथ यहां दर्शनों के लिए आता है. उसे जीवन के समस्त पापों से मुक्ति मिलती है.
नागेश्वर ज्योतिर्लिग के संम्बन्ध में एक कथा प्रसिद्ध है. कथा के अनुसार एक धर्म कर्म में विश्वास करने वाला व्यापारी था. भगवान शिव में उसकी अनन्य भक्ति थी. व्यापारिक कार्यो में व्यस्त रहने के बाद भी वह जो समय बचता उसे आराधना, पूजन और ध्यान में लगाता था.
उसकी इस भक्ति से एक दारुक नाम का राक्षस नाराज हो गया. राक्षस प्रवृ्ति का होने के कारण उसे भगवान शिव जरा भी अच्छे नहीं लगते थे.
वह राक्षस सदा ही ऎसे अवसर की तलाश में रहता था, कि वह किस तरह व्यापारी की भक्ति में बाधा पहुंचा सकें. एक बार वह व्यापारी नौका से कहीं व्यापारिक कार्य से जा रहा था. उस राक्षस ने यह देख लिया, और उसने अवसर पाकर नौका पर आक्रमण कर दिया. और नौका के यात्रियों को राजधानी में ले जाकर कैद कर लिया.
कैद में भी व्यापारी नित्यक्रम से भगवान शिव की पूजा में लगा रहता था.
बंदी गृ्ह में भी व्यापारी के शिव पूजन का समाचार जब उस राक्षस तक पहुंचा तो उसे बहुत बुरा लगा. वह क्रोध भाव में व्यापारी के पास कारागार में पहुंचा. व्यापारी उस समय पूजा और ध्यान में मग्न था. राक्षस ने उसपर उसी मुद्रा में क्रोध करना प्रारम्भ कर दिया. राक्षस के क्रोध का कोई प्रभाव जब व्यापारी पर नहीं हुआ तो राक्षस ने अपने अनुचरों से कहा कि वे व्यापारी को मार डालें.
यह आदेश भी व्यापारी को विचलित न कर सकें. इस पर भी व्यापारी अपनी और अपने साथियों की मुक्ति के लिए भगवान शिव से प्रार्थना करने लगा. उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसी कारागार में एक ज्योतिर्लिंग रुप में प्रकट हुए. और व्यापारी को पाशुपत- अस्त्र स्वयं की रक्षा करने के लिए दिया. इस अस्त्र से राक्षस दारूक तथा उसके अनुचरो का वध कर दिया. उसी समय से भगवान शिव के इस ज्योतिर्लिंग का नाम नागेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुआ.
भारत के कुछ अन्य स्थानों में स्थित ज्योतिर्लिंगों को भी नागेश्वर ज्योतिर्लिग का नाम दिया जाता है. इस संबन्ध में कई मत सामने आते है. हैदराबाद, आन्घ्र प्रदेश का ज्योतिर्लिम्ग भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है. इसके अतिरिक्त उत्तराखंड के अल्मोडा नामक स्थान में भी योगेश या जागेश्वर शिवलिंग है, भक्त जन इसे भी नागेश्वर के नाम से बुलाते है.
परन्तु शिवपुराण में केवल द्वारका के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग को ही एक मात्र नागेश्वर ज्योतिर्लिग माना गया है. एक अन्य धार्मिक शास्त्र के अनुसार भारत के दस ज्योतिर्लिगों में नागेश दारूकावने का नाम आता है. यह स्थान आज जागेश्वर के नाम से जाना जाता है. नागेश्वर का नाम योगेश्वर या जोगेश्वर किस प्रकार बना इसका कारण स्थान परिवर्तन के कारण शब्दों में परिवर्तन से है.
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग अल्मोडा के विषय में यह लोकमान्यताएं है, पहाडी इलाकों में एक नाग प्रजाती रहती है. वहां से प्राप्त प्राचीन अवशेषों में नाग मूर्तिया, सांप के कुछ चिन्ह प्राप्त हुए है. नाग पूजा को आज भी यहां विशेष महत्व दिया गया है. अल्मोडा में जहां यह मंदिर स्थित है, वहां आसपास के क्षेत्रों के नाम प्राचीन काल से ही नागों के नाम पर आधारित है. इन्हीं में से कुछ नाम वेरीनाग, धौलेनाग, कालियनाग आदि है. भूत प्रेतों से मुक्ति के लिए भी नाग पूजा की जाती है.
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